श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  2.7.97 
“মুকুন্দ, আমার তুমি কৈলে বন্ধু-কার্য
দেখাইলে ভক্ত বিদ্যানিধি ভট্টাচার্য
“मुकुन्द, आमार तुमि कैले बन्धु-कार्य
देखाइले भक्त विद्यानिधि भट्टाचार्य
 
 
अनुवाद
हे मुकुन्द, तुमने मेरे सच्चे मित्र की भूमिका निभाई है, क्योंकि तुमने मुझे महान भक्त विद्यानिधि भट्टाचार्य का दर्शन कराया है।
 
O Mukunda, you have played the role of a true friend to me, for you have shown me the great devotee Vidyanidhi Bhattacharya.
तात्पर्य
पुंडरीक विद्याननाधि वास्तव में "भक्ति विद्याननाधि" था। सामान्यतया लोग बस उसे "विद्याननाधि" कहते। भक्ति विद्याननाधि की वास्तविक स्थिति को समझकर, गदाधर ने भक्तों और मूर्ख भौतिकवादियों के दृष्टिकोण के बीच अंतर स्थापित किया। जो लोग भगवान के भक्तों की विशेषताओं में विश्वास नहीं रखते, वे अक्सर अधर्मी लोगों की गतिविधियों को भक्तों की गतिविधियों के समान मानते हैं।

पुंडरीक और गदाधर ने श्री गौर-लीला में यह लीला इसलिए रची ताकि वे उन अनापश्रद्धालुओं की तुच्छता का प्रदर्शन करें जो भक्तों और अनापश्रद्धालुओं के बीच भेदभाव में अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं और जो यह समझ नहीं पाने के कारण भ्रम में पड़ जाते हैं कि क्यों श्री नवद्वीप-धाम प्रचारिणी-सभा और श्री विश्व-वैष्णव राज-सभा के सेवक भक्तों को उनकी भक्ति सेवा के स्तर को दर्शाने वाली उपाधियों से सम्मानित करके उनका सम्मान करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)