पुंडरीक और गदाधर ने श्री गौर-लीला में यह लीला इसलिए रची ताकि वे उन अनापश्रद्धालुओं की तुच्छता का प्रदर्शन करें जो भक्तों और अनापश्रद्धालुओं के बीच भेदभाव में अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं और जो यह समझ नहीं पाने के कारण भ्रम में पड़ जाते हैं कि क्यों श्री नवद्वीप-धाम प्रचारिणी-सभा और श्री विश्व-वैष्णव राज-सभा के सेवक भक्तों को उनकी भक्ति सेवा के स्तर को दर्शाने वाली उपाधियों से सम्मानित करके उनका सम्मान करते हैं।
