श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  2.7.93 
তিল-মাত্র ধাতু নাহি সকল-শরীরে
ডুবিলেন বিদ্যানিধি আনন্দ-সাগরে
तिल-मात्र धातु नाहि सकल-शरीरे
डुबिलेन विद्यानिधि आनन्द-सागरे
 
 
अनुवाद
विद्यानिधि पूर्णतः आनंद के सागर में डूबे हुए थे और उनके पूरे शरीर में जीवन का कोई लक्षण प्रकट नहीं हो रहा था।
 
Vidyanidhi was completely immersed in the ocean of bliss and there was no sign of life in his entire body.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)