श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.7.9 
এবে শুন শ্রী-বিদ্যানিধির আগমন
’পুণ্ডরীক’ নাম—শ্রী-কৃষ্ণের প্রিযতম
एबे शुन श्री-विद्यानिधिर आगमन
’पुण्डरीक’ नाम—श्री-कृष्णेर प्रियतम
 
 
अनुवाद
अब श्री विद्यानिधि के आगमन का वर्णन सुनो। उनका नाम पुण्डरीक था और वे भगवान कृष्ण को अत्यंत प्रिय थे।
 
Now listen to the description of the arrival of Sri Vidyanidhi. His name was Pundarika, and he was very dear to Lord Krishna.
तात्पर्य
श्री पुंडरीक विद्यानिधि एक विद्वान और भगवान कृष्ण के अति प्रिय भक्त थे।

वैदिक साहित्य में परम भगवान को अक्सर पुंडरीकाक्ष के रूप में संबोधित किया जाता है। इसलिए पुंडरीक विद्यानिधि उस भगवान के समर्पित भक्त के रूप में प्रसिद्ध थे।

छान्दोग्य उपनिषद (1.6.7) में कहा गया है: तस्य यथा कपयासं पुंडरीकमेवम अक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदिता उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवम वेद-"उस व्यक्तित्व की आँखें कमल की तरह सुंदर हैं। वह पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से अछूता है, और जो कोई भी उस व्यक्तित्व की पूजा करता है वह भी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से अछूता हो जाता है।"

गौड़-देश के पूर्वी क्षितिज पर स्थित चटगाँव प्रांत की पवित्रता को बढ़ाने के लिए, भगवान ने अपने प्रिय भक्त पुंडरीक विद्यानिधि को वहाँ प्रकट कराया। विद्यानिधि के प्रकट होने के स्थान को मेखला-ग्राम के रूप में जाना जाता है, जो चटगाँव जिले के हाटा-हजारि पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)