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श्लोक 2.7.71  |
বুঝি’ গদাধর-চিত্ত শ্রী-মুকুন্দানন্দ
বিদ্যানিধি-প্রকাশিতে করিলা আরম্ভ |
बुझि’ गदाधर-चित्त श्री-मुकुन्दानन्द
विद्यानिधि-प्रकाशिते करिला आरम्भ |
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| अनुवाद |
| गदाधर के हृदय की बात समझकर श्री मुकुन्द प्रसन्नतापूर्वक विद्यानिधि की महिमा बताने लगे। |
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| Understanding the thoughts of Gadhdhar's heart, Shri Mukunda happily started telling the glory of Vidyanidhi. |
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