श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.7.6 
অদ্বৈত লৈযা সব বৈষ্ণব-মণ্ডল
মহা-নৃত্য-গীত করে কৃষ্ণ-কোলাহল
अद्वैत लैया सब वैष्णव-मण्डल
महा-नृत्य-गीत करे कृष्ण-कोलाहल
 
 
अनुवाद
सभी भक्त अद्वैत के साथ नृत्य कर रहे थे और जोर-जोर से कृष्ण के नामों का कीर्तन कर रहे थे।
 
All the devotees were dancing with Advaita and loudly chanting the names of Krishna.
तात्पर्य
समाज में दो प्रकार के लोग रहते हैं—पहले वैष्णव-मंडल (दैव-समाज) कहलाते हैं, जो भगवान विष्णु की भक्ति सेवा में लगे रहते हैं, और दूसरे अवैष्णव-मंडल (असुर-समाज) कहलाते हैं, जो भगवान विष्णु की भक्ति सेवा से रहित होते हैं और अनेक देवताओं की पूजा करने में लगे रहते हैं। श्री अद्वैत प्रभु उस वैष्णव-समाज के नेता थे। पद्म पुराण में कहा गया है:

द्वौ भूत-सर्गौ लोके 'स्मिन् दैव आсур एव च

विष्णु-भक्तः स्मृतो दैव आसुराः तद-विपर्ययः

“बने हुए संसार में मनुष्यों की दो श्रेणियां हैं। एक का निर्माण आसुरी और दूसरे का निर्माण दैवी से हुआ है। भगवान विष्णु के भक्त दैवी होते हैं, जबकि जो इसके विपरीत होते हैं वे आसुरी कहलाते हैं।”

अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए, बद्ध आत्माएँ व्यर्थ के शब्द ज़्यादा करती हैं। हालाँकि, भगवान के भक्त, कृष्ण की सेवा के लिए भरपूर नाचते और गाते हैं और इस प्रकार भगवान की सेवा के लिए अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)