द्वौ भूत-सर्गौ लोके 'स्मिन् दैव आсур एव च
विष्णु-भक्तः स्मृतो दैव आसुराः तद-विपर्ययः
“बने हुए संसार में मनुष्यों की दो श्रेणियां हैं। एक का निर्माण आसुरी और दूसरे का निर्माण दैवी से हुआ है। भगवान विष्णु के भक्त दैवी होते हैं, जबकि जो इसके विपरीत होते हैं वे आसुरी कहलाते हैं।”
अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए, बद्ध आत्माएँ व्यर्थ के शब्द ज़्यादा करती हैं। हालाँकि, भगवान के भक्त, कृष्ण की सेवा के लिए भरपूर नाचते और गाते हैं और इस प्रकार भगवान की सेवा के लिए अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करते हैं।
