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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन
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श्लोक 32
श्लोक
2.7.32
তাঙ্রে না দেখিযা আমি স্বস্তি নাহি পাই
সবে তাঙ্রে আকর্ষিযা আনহ এথাই”
ताङ्रे ना देखिया आमि स्वस्ति नाहि पाइ
सबे ताङ्रे आकर्षिया आनह एथाइ”
अनुवाद
"उसे देखे बिना मुझे मन की शांति नहीं मिलती। इसलिए आप सब उसे यहाँ आने के लिए आकर्षित करते हैं।"
"I can't find peace of mind without seeing him. That's why you all entice him to come here."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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