श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.7.25 
গঙ্গা-স্নান না করেন পদ-স্পর্শ-ভযে
গঙ্গা দরশন করে নিশার সমযে
गङ्गा-स्नान ना करेन पद-स्पर्श-भये
गङ्गा दरशन करे निशार समये
 
 
अनुवाद
"वह गंगा में स्नान नहीं करता, क्योंकि उसे उसके जल को अपने पैरों से छूने से डर लगता है। वह गंगा के दर्शन केवल रात्रि में ही करता है।"
 
"He does not bathe in the Ganges, for he is afraid of touching its water with his feet. He visits the Ganges only at night."
तात्पर्य
वह गंगा में नहाया नहीं, जैसे कर्मकाण्डी लोग पापों को धोने के लिए स्नान करते हैं। परन्तु चूँकि विष्णु के चरण कमलों से निकले उस जल के प्रति उसके मन में अगाध श्रद्धा और अटूट विश्वास था, फिर भी क्योंकि उसे अपने पैरों के जल को स्पर्श करने का भय था उसने स्नान नहीं किया, इसलिए वह लोगों की नजरों से बचकर रात में श्री गंगा का दर्शन करता था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)