श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.7.24 
কৃষ্ণ-ভক্তি-সিন্ধু-মাঝে ভাসে নিরন্তর
অশ্রু-কম্প-পুলক-বেষ্টিত কলেবর
कृष्ण-भक्ति-सिन्धु-माझे भासे निरन्तर
अश्रु-कम्प-पुलक-वेष्टित कलेवर
 
 
अनुवाद
"वे निरंतर कृष्ण भक्ति के सागर में तैरते रहते हैं। उनका शरीर अश्रुधारा, कम्पन और रोंगटे खड़े होने जैसे परमानंद प्रेम के लक्षणों से सुशोभित है।
 
"He constantly swims in the ocean of devotion to Krishna. His body is adorned with the symptoms of ecstatic love, such as tears, trembling, and goosebumps.
तात्पर्य
सामान्य जीव को कृष्ण से असंबंधित विषयों में आसक्ति होती है और वे भौतिक वस्तुओं का भोग करने में व्यस्त रहते हैं, किन्तु पुंडरीक विद्यानidhi के साथ मामला ऐसा नहीं था। वे निरंतर कृष्ण सेवा में लगे रहते थे और उनके शरीर पर आनंदाश्रु, कंपन और रोमांच जैसे प्रेम के लक्षण निरंतर विराजते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)