श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  2.7.150 
এতেকে উহান আমি হৈবাঙ শিষ্য
শিষ্য-অপরাধ গুরু ক্ষমিবে অবশ্য”
एतेके उहान आमि हैबाङ शिष्य
शिष्य-अपराध गुरु क्षमिबे अवश्य”
 
 
अनुवाद
“इसलिए मैं उनका शिष्य बनना चाहता हूँ, क्योंकि आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्य के अपराधों को अवश्य क्षमा कर देंगे।”
 
“That is why I want to become his disciple, because the spiritual master will definitely forgive the crimes of his disciple.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)