श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  2.7.145 
অদ্বৈত-দেবের আগে করি’ নমস্কার
যথা-যোগ্য প্রেম-ভক্তি করিলা সবার
अद्वैत-देवेर आगे करि’ नमस्कार
यथा-योग्य प्रेम-भक्ति करिला सबार
 
 
अनुवाद
उन्होंने श्री अद्वैत प्रभु को नमस्कार किया और फिर बाकी सभी को उचित प्रेम और भक्ति प्रदान की।
 
He saluted Sri Advaita Prabhu and then offered due love and devotion to everyone else.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)