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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन
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श्लोक 129
श्लोक
2.7.129
’বিদ্যানিধি’-হেন কোন বৈষ্ণব না চিনে
সবেই কান্দেন-মাত্র তাঙ্হার ক্রন্দনে
’विद्यानिधि’-हेन कोन वैष्णव ना चिने
सबेइ कान्देन-मात्र ताङ्हार क्रन्दने
अनुवाद
ऐसा कोई वैष्णव नहीं था जो विद्यानिधि की स्थिति को न पहचानता हो। जब वह रोता था, तो सभी रोते थे।
There wasn't a single Vaishnava who didn't recognize Vidyanidhi's plight. When he cried, everyone cried.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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