श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.7.111 
পরম সম্ভ্রমে রহিলেন গদাধর
মুকুন্দ কহেন তাঙ্র মনের উত্তর
परम सम्भ्रमे रहिलेन गदाधर
मुकुन्द कहेन ताङ्र मनेर उत्तर
 
 
अनुवाद
जब गदाधर वहां विस्मय और श्रद्धा से खड़े थे, मुकुंद ने गदाधर के मन की बात प्रकट की।
 
While Gadadhara stood there in awe and reverence, Mukunda revealed what was in Gadadhara's mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)