श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  2.7.108 
প্রহর-দুইতে বিদ্যানিধি মহাধীর
বাহ্য পাই’ বসিলেন হৈযা সুস্থির
प्रहर-दुइते विद्यानिधि महाधीर
बाह्य पाइ’ वसिलेन हैया सुस्थिर
 
 
अनुवाद
छः घंटे के पश्चात् अत्यन्त गम्भीर विद्यानिधि को बाह्य चेतना वापस मिली और वे शांतिपूर्वक बैठ गये।
 
After six hours, the very serious Vidyanidhi regained his external consciousness and sat down peacefully.
तात्पर्य
पुंडरीक विद्यानिधि प्रेम में इतने खोए हुए थे कि वे ढाई पहर या पंद्रह डंडे यानी छह घंटे तक हरी की सेवा करते रहे। जब उन्हें बाहरी चेतना प्राप्त हुई, तो वे शांत हो गए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)