श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 7: गदाधर और पुण्डरीक का मिलन  »  श्लोक 104-105
 
 
श्लोक  2.7.104-105 
এ পথেতে আমি উপদেষ্টা নাহি করি
ইহানেই স্থানে মন্ত্র-উপদেশ ধরি
ইহানে অবজ্ঞা যত করিযাছি মনে
শিষ্য হৈলে সব দোষ ক্ষমিবে আপনে”
ए पथेते आमि उपदेष्टा नाहि करि
इहानेइ स्थाने मन्त्र-उपदेश धरि
इहाने अवज्ञा यत करियाछि मने
शिष्य हैले सब दोष क्षमिबे आपने”
 
 
अनुवाद
"अभी तक मेरा कोई गुरु नहीं है। मेरी इच्छा उनसे मंत्र दीक्षा लेने की है। अगर मैं उनका शिष्य बन जाऊँ, तो वे मेरे उन सभी अपराधों को क्षमा कर देंगे जो मैंने उनकी अवहेलना करके किए हैं।"
 
"I don't have a guru yet. I wish to receive mantra initiation from him. If I become his disciple, he will forgive all the crimes I have committed by disobeying him."
तात्पर्य
गदाधर ने कहा, 'हर कार्य के लिए निर्देश होते हैं, और जब तक कोई शिक्षक की शरण में नहीं जाता, तब तक कोई भी कार्य सही ढंग से नहीं कर सकता। चूंकि मैंने अभी तक किसी शिक्षक का चयन नहीं किया है, इसलिए मुझे इस कठिनाई का सामना करना पड़ा। अब मैं निश्चित रूप से पुंडरीक की शरण लूँगा। तब उनके चरणों में मेरे सभी अपराध नष्ट हो जाएँगे।'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)