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श्लोक 2.7.100-101  |
বিষযীর পরিচ্ছদ দেখিযা উহান
’বিষযী-বৈষ্ণব’ মোর চিত্তে হৈল জ্ঞান
বুঝিযা আমার চিত্ত তুমি মহাশয
প্রকাশিলা পুণ্ডরীক-ভক্তির উদয |
विषयीर परिच्छद देखिया उहान
’विषयी-वैष्णव’ मोर चित्ते हैल ज्ञान
बुझिया आमार चित्त तुमि महाशय
प्रकाशिला पुण्डरीक-भक्तिर उदय |
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| अनुवाद |
| "उनके भौतिक रूप को देखकर मैंने उन्हें एक भौतिकवादी वैष्णव समझा। आपने मेरे मन की बात समझ ली और पुण्डरीक की भक्तिमयी भावना प्रकट कर दी।" |
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| "Seeing his physical form, I thought him to be a materialistic Vaishnava. You understood my thoughts and revealed the devotional feelings of Paundarik." |
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