श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 79
 
 
श्लोक  2.6.79 
কোটি মহা-সূর্য জিনি’ তেজে নাহি অন্ত
পাদ-পদ্মে রমা, ছত্র ধরযে অনন্ত
कोटि महा-सूर्य जिनि’ तेजे नाहि अन्त
पाद-पद्मे रमा, छत्र धरये अनन्त
 
 
अनुवाद
उनका असीम तेज करोड़ों सूर्यों के तेज को भी मात कर रहा था। लक्ष्मी जी उनके चरणकमलों में बैठी थीं और अनंत उनके सिर पर छत्र धारण किए हुए थे।
 
His boundless radiance outshone even the radiance of millions of suns. Goddess Lakshmi sat at his feet, and Ananta held a parasol over his head.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)