श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  2.6.77 
দুই বাহু দিব্য কনকের স্তম্ভ জিনি’
তঙ্হি’ দিব্য আভরণ রত্নের খিচনি
दुइ बाहु दिव्य कनकेर स्तम्भ जिनि’
तङ्हि’ दिव्य आभरण रत्नेर खिचनि
 
 
अनुवाद
विभिन्न आभूषणों और रत्नों से सुसज्जित उनकी दोनों भुजाएँ दो स्वर्ण स्तंभों के समान प्रतीत हो रही थीं।
 
Both his arms, adorned with various ornaments and gems, appeared like two golden pillars.
तात्पर्य
श्री गौरासुंदर के दोनों हाथों ने स्वर्ण स्तंभों की सुंदरता पर विजय प्राप्त कर ली। वे हाथ दिव्य आभूषणों से अलंकृत थे और ऐसे लग रहे थे मानो जवाहरातों से सजे स्वर्ण स्तंभ हों।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)