श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.6.44 
স্থির হয অদ্বৈত, হৈতে নারে স্থির
ভাবাবেশে নিরবধি দোলায শরীর
स्थिर हय अद्वैत, हैते नारे स्थिर
भावावेशे निरवधि दोलाय शरीर
 
 
अनुवाद
यद्यपि अद्वैत ने स्वयं को शांत करने का प्रयास किया, फिर भी वे ऐसा नहीं कर पाए। उनका शरीर ईश्वर के प्रेम में निरन्तर आगे-पीछे हिल रहा था।
 
Although Advaita tried to calm himself, he could not. His body was constantly swaying back and forth in love for God.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)