श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.6.43 
কেবা কোন্ দিকে কাঙ্দে নাহি পরাপর
কৃষ্ণ-প্রেম-ময হৈল অদ্বৈতের ঘর
केबा कोन् दिके काङ्दे नाहि परापर
कृष्ण-प्रेम-मय हैल अद्वैतेर घर
 
 
अनुवाद
किसी को पता नहीं चला कि कौन रोया जबकि अद्वैत का पूरा परिवार कृष्ण के प्रेम से भर गया।
 
No one knew who cried while Advaita's entire family was filled with love for Krishna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)