श्रीमद् अद्वैत आचार्य ने रमाई से कहा, “हे रमाई, तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राता, श्रीवास, सेवा-तत्वज्ञान में मेरी कुशलता को जानते हैं।”