वेदाध्याय रता नित्यं नित्यं वै यज्ञयाजकाः
अग्निहोत्र रता नित्यं विष्णुधर्मपरां मुखः
निंदन्ति विष्णु भक्तांश्च वेद बाह्यः सुरेश्वरी
“हे सुरेश्वरी! जो लोग नित्य वेदों का अध्ययन और यज्ञयाग करके भी भगवान की भक्ति की नित्य लीलाओं से विमुख रहते हैं, साथ ही जो वेद विहित कर्मों में अनास्था रखते हैं, वे सदैव भगवान और उनके भक्तों की ही निंदा करते हैं।”
