श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.6.17 
আনন্দে বিহ্বল—পথ না জানে রামাই
শ্রী-চৈতন্য-আজ্ঞা লৈ’ গেলা সেই ঠাঞি
आनन्दे विह्वल—पथ ना जाने रामाइ
श्री-चैतन्य-आज्ञा लै’ गेला सेइ ठाञि
 
 
अनुवाद
रामाई आनंद में डूबे हुए थे और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे किस ओर जा रहे हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश मात्र से वे अपने गंतव्य पर पहुँच गए।
 
Ramai was immersed in bliss and did not know where he was headed. With a mere command from Sri Chaitanya Mahaprabhu, he reached his destination.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)