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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन
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श्लोक 163
श्लोक
2.6.163
কি চাহিমু, কিবা নাহি জানহ আপনে
কিবা নাহি দেখ তুমি দিব্য-দরশনে”
कि चाहिमु, किबा नाहि जानह आपने
किबा नाहि देख तुमि दिव्य-दरशने”
अनुवाद
"मैं क्या माँगूँ? आप भली-भाँति जानते हैं कि मुझमें क्या कमी है। ऐसा क्या है जो आप अपनी दिव्य दृष्टि से नहीं देख पाते?"
"What should I ask for? You know very well what I lack. What is it that you cannot see with your divine vision?"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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