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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन
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श्लोक 145
श्लोक
2.6.145
অবশেষে আসি’ সবে রহে দাস্য-ভাবে
বুঝন না যায সেই অচিন্ত্য-প্রভাবে
अवशेषे आसि’ सबे रहे दास्य-भावे
बुझन ना याय सेइ अचिन्त्य-प्रभावे
अनुवाद
अन्त में वे दास भाव में ही रहे, उनकी अकल्पनीय महिमा को कोई समझ न सका।
In the end he remained in a slave state, no one could understand his unimaginable glory.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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