श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  2.6.135 
চরণ অর্পন শিরে করিলা যখন
’জয জয’ মহাধ্বনি হৈল তখন
चरण अर्पन शिरे करिला यखन
’जय जय’ महाध्वनि हैल तखन
 
 
अनुवाद
जैसे ही भगवान ने अपने चरण कमल अद्वैत के मस्तक पर रखे, “जय! जय!” का प्रचण्ड स्पंदन उत्पन्न हुआ।
 
As soon as the Lord placed His lotus feet on Advaita's head, a tremendous vibration of "Jai! Jai!" arose.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)