श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  2.6.130 
সত্যলোক আক্রমিল এই সে চরণে
বলি-শির ধন্য হৈল ইহার অর্পণে
सत्यलोक आक्रमिल एइ से चरणे
बलि-शिर धन्य हैल इहार अर्पणे
 
 
अनुवाद
इन चरणकमलों ने सम्पूर्ण सत्यलोक को ढक लिया और बलि महाराज का मस्तक इन चरणकमलों के स्पर्श से शोभायमान हो गया।
 
These lotus feet covered the entire Satyaloka, and the head of Bali Maharaja became beautiful by the touch of these lotus feet.
तात्पर्य
श्री वामनदेव के कमल चरणों से संपूर्ण सत्यलोक आच्छादित हो गया। (देखें श्रीमद् भागवतम 8.20.33-34) परम भगवान के कमल चरणों के अतिरिक्त और कुछ भी सत्य के रूप में स्थापित नहीं हो सकता। अन्य सभी काल्पनिक सत्य भ्रम से आच्छादित हैं। परम भगवान एकमात्र वास्तविक सत्य हैं। श्रीमद् भागवतम के प्रथम श्लोक और सत्य-व्रतम् सत्य-परम् त्रि-सत्यम् (भाग. 10.2.26) जैसे अन्य श्लोकों में इसकी पुष्टि की गयी है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)