श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  2.6.117 
জয জয ’হরে-কৃষ্ণ’-মন্ত্রের প্রকাশ
জয জয নিজ-ভক্তি-গ্রহণ-বিলাস
जय जय ’हरे-कृष्ण’-मन्त्रेर प्रकाश
जय जय निज-भक्ति-ग्रहण-विलास
 
 
अनुवाद
हरे कृष्ण महामंत्र के जाप का सूत्रपात करने वाले की जय हो! अपनी भक्ति स्वीकार करने की लीलाओं का आनंद लेने वाले की जय हो!
 
Victory to the one who initiated the chanting of the Hare Krishna mantra! Victory to the one who enjoys the pastimes of accepting His devotion!
तात्पर्य
महामंत्र है- हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे। इस महामंत्र का प्रचार करने वाले श्री गौरसुंदर की जय हो। इसके द्वारा यह इंगित किया गया है कि जो लोग श्री गौरसुंदर के प्रचारित इस हरे कृष्ण महामंत्र के मार्ग में बाधा डालते हैं वे गौरांग के विरोधी हैं। श्री गौरसुंदर स्वयं भगवान कृष्ण हैं। यद्यपि वे श्री कृष्ण हैं, वे व्यक्तिगत रूप से भक्ति सेवा की प्रक्रिया को स्वीकार करने और निष्पादित करने के लिए लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं ताकि जीवों को उनकी पूजा करने की प्रक्रिया सिखाई जा सके। अथवा वे जीवों को अपनी भक्ति सेवा स्वीकार करने के लिए प्रेरित करने के लिए एक भक्त के रूप में अपने लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)