श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  2.6.116 
জয জয সিন্ধু-সুতা-রূপ-মনোরম
জয জয শ্রীবত্স-কৌস্তুভ-বিভুষণ
जय जय सिन्धु-सुता-रूप-मनोरम
जय जय श्रीवत्स-कौस्तुभ-विभुषण
 
 
अनुवाद
समुद्रपुत्री लक्ष्मीजी के सौन्दर्य पर मोहित प्रभु की जय हो! श्रीवत्स चिन्ह और कौस्तुभ मणि से सुशोभित प्रभु की जय हो!
 
Glory to the Lord who is captivated by the beauty of Lakshmi, the daughter of the ocean! Glory to the Lord adorned with the Srivatsa symbol and the Kaustubha gem!
तात्पर्य
शब्द सिंधु-सुता-रूप-मनोरम प्रभु को संदर्भित करता है, जिसकी मानसिक खुशी समुद्र की बेटी, श्री लक्ष्मीदेवी की सुंदरता को देखकर बढ़ती है। समुद्र के मंथन के दौरान लक्ष्मीदेवी समुद्र से प्रकट हुईं, इसलिए उनका नाम सिंधु-सुता भी है। श्रीमद् भागवतम (8.8.8) में कहा गया है:

ततः चावीरभूत साक्षात्

श्री रामा भगवत्-परा

रंजयंती दिशः कान्त्या

विद्युत सौदामनी यथा

“फिर भाग्य की देवी, रामा प्रकट हुईं, जो सर्वोच्च भगवान भगवान द्वारा आनंद के लिए बिल्कुल समर्पित हैं। वह बिजली की तरह प्रकट हुईं, संगमरमर के पहाड़ को रोशन करने वाली बिजली को पार करते हुए।”

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)