श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 6: अद्वैत आचार्य से भगवान की मिलन  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.6.111 
শাস্ত্র-দৃষ্ট্যে পূজা করি’ পটল-বিধানে
এই শ্লোক পডি’ করে দণ্ড-পরণামে
शास्त्र-दृष्ट्ये पूजा करि’ पटल-विधाने
एइ श्लोक पडि’ करे दण्ड-परणामे
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य ने शास्त्रों के पंचरात्रिक विधान के अनुसार भगवान की पूजा की। उन्होंने निम्नलिखित श्लोक का पाठ करते हुए उन्हें नमस्कार किया।
 
Advaita Acharya worshipped the Lord according to the Pancharatrika rituals of the scriptures. He offered his obeisances to Him by reciting the following verse.
तात्पर्य
पटल-विधान वाक्यांश से तात्पर्य पंचरात्रिकी नियमों से है जिनका वर्णन शास्त्र के विभिन्न पाठों या अध्यायों में किया गया है। श्री अद्वैत आचार्य प्रभु ने शास्त्रों में बताए गए पंचरात्रिकी नियमों और विनियमों के अनुसार महाप्रभु की पूजा की। शास्त्र-दृष्टये और पटल-विधाने वाक्यांशों का उपयोग करके, श्री चैतन्य-भागवत के लेखक ने उन लोगों को संकेत दिया है जो भगवान की सेवा के लिए इच्छुक हैं कि अद्वैत आचार्य प्रभु ने श्री गौर-मंत्र के साथ गौर की पूजा की। हम इस पूजा पद्धति को श्री ध्यानचंद्र की पद्धति के साथ-साथ कई अन्य पंचरात्र साहित्य जैसे ऊर्ध्वामनाय तंत्र में भी पाते हैं। इन साहित्यों में गौर-मंत्र के साथ गौर की पूजा करने की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। अद्वैत आचार्य प्रभु ने शास्त्रों पर आधारित पंचरात्रिकी नियमों और विनियमों के अनुसार महाप्रभु की पूजा की, और यह प्रकट करने के लिए कि भगवान गौरासुंदर विष्णु से भिन्न नहीं हैं, उन्होंने नमो ब्रह्मण्य-देवाय से शुरू होने वाले छंद का पाठ करके महाप्रभु को प्रार्थनाएँ अर्पित कीं। नमो ब्रह्मण्य-देवाय से शुरू होने वाले छंद को उद्धृत करके, श्री चैतन्य-भागवत के लेखक ने गौर-मंत्र का खंडन नहीं किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)