श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  2.5.91 
দেখিলেন নিত্যানন্দ প্রভু বিশ্বম্ভর
মালা তুলি’ দিলা তাঙ্র মস্তক-উপর
देखिलेन नित्यानन्द प्रभु विश्वम्भर
माला तुलि’ दिला ताङ्र मस्तक-उपर
 
 
अनुवाद
जैसे ही नित्यानंद ने भगवान विश्वम्भर को अपने सामने खड़ा देखा, उन्होंने उन्हें माला अर्पित कर दी।
 
As soon as Nityananda saw Lord Visvambhara standing before him, he offered him the garland.
तात्पर्य
श्री नित्यानन्द श्रीवासु के शब्दों से प्रभावित नहीं हुए, इसलिए उन्होंने माला अपने हाथों में ली, कुछ कहा और चारों ओर देखा। जब नित्यानन्द ने श्री व्यास को प्रणाम नहीं किया और श्रीवासु ने इस बारे में महाप्रभु को बताया, तो महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु को माला के साथ श्री व्यास की पूजा करने का निर्देश दिया। उसके बाद महाप्रभु ने नित्यानन्द को उन्हें माला अर्पित करते देखा। इस प्रकार श्री नित्यानन्द ने उस व्यक्तित्व को माला अर्पित कर व्यास-पूजा पूरी की, जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है और जिसके अधिकार प्राप्त अवतार श्री व्यास हैं। भगवान श्री चैतन्यदेव में सभी विस्तार, अवतार, ऊर्जा और भक्त शामिल हैं। इसलिए, दो छंदों, यथा तरोर मूल-निक्षेणेन और सत्त्वं विशुद्धं वासुदेव-शब्दितं के विचार के अनुसार, श्री चैतन्यदेव की पूजा करके, जो हर चीज़ के मूल स्रोत हैं, सभी आध्यात्मिक गुरुओं की स्वतः ही पूजा की जाती है। इसके अलावा, शिष्य परंपरा की श्रृंखला का वर्णन करते हुए, धर्मग्रंथ कहते हैं: "ब्रह्मांड के निर्माता भगवान ब्रह्मा, भगवान श्री कृष्ण के शिष्य बने। ब्रह्मा के शिष्य नारद थे। नारद के शिष्य व्यास थे। प्रसिद्ध माधवाचार्य ने व्यास से दीक्षा प्राप्त की। माधवाचार्य के शिष्य महान पदमनाभाचार्य थे। पदमनाभाचार्य के शिष्य नरहरि थे। नरहरि के शिष्य माधव थे। माधव के शिष्य अक्षोभ्य थे। अक्षोभ्य के शिष्य जयतीर्थ थे, जिनके शिष्य ज्ञानसिंधु थे। ज्ञानसिंधु के शिष्य महानिधि थे, जिनके शिष्य विद्यानidhi थे। विद्यानidhi के शिष्य राजेंद्र थे, जिनके शिष्य जयधर्म मुनि थे। जयधर्म के शिष्य पुरुषोत्तम थे, जिनके शिष्य व्यासतीर्थ थे। व्यासतीर्थ के शिष्य श्रीमन लक्ष्मीपति थे, जो भक्ति सेवा के अमृत के एक महान जलाशय की तरह थे। लक्ष्मीपति के शिष्य माधवेंद्र पुरी, भक्ति सेवा के एक महान प्रचारक थे। माधवेंद्र पुरी के शिष्यों में श्रीमान ईश्वर पुरी, अद्वैत आचार्य और नित्यानन्द प्रभु थे। मैं भगवान चैतन्य की पूजा करता हूँ, जिन्होंने श्रीमान ईश्वर पुरी को अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)