श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.5.87 
কিবা বলে ধীরে ধীরে বুঝন না যায
মালা হাতে করি’ পুনঃ চারি-দিকে চায
किबा बले धीरे धीरे बुझन ना याय
माला हाते करि’ पुनः चारि-दिके चाय
 
 
अनुवाद
उन्होंने कुछ ऐसा बुदबुदाया जिसे कोई भी समझ नहीं सका, और माला हाथ में लिए हुए उन्होंने चारों ओर देखा।
 
He muttered something that no one could understand, and with the rosary in his hand, he looked around.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)