श्रुति-स्मृति-पुराणादि-
पंचरात्र-विधिं विना
एकांतिकी हरिर्भक्तिः
उत्पातायैव कल्पते
"'उपनिषद, पुराण और नारद पंचरात्र जैसे अधिकृत वैदिक साहित्य को न मानकर भगवान की भक्ति सेवा करना, समाज में महज़ परेशानी ही खड़ी करना है।" श्री नित्यानंद प्रभु जैसे अवधूत परमहंस द्वारा एक संन्यासी से, जो परंपरागत मंच पर थे, ब्रह्मचारी प्रतीकों को ग्रहण किया जाना भक्त सेवा के लिए कई तरह के प्रतिकूल विचार उत्पन्न करेगा, इसलिए नित्यानंद प्रभु, जो वर्णाश्रम के नियमों से परे हैं, ने उन छोटी-मोटी औपचारिकता को ख़त्म कर दिया। लेकिन जो व्यक्ति भौतिकता में डूबे हुए खुद की महिमा का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करने की कोशिश करते हैं और अपनी क्षमता से बढ़कर काम करके अच्छाई हासिल करना चाहते हैं, वे अपने ऐसे कामों से कभी भी कोई लाभ नहीं उठा सकते हैं। सभी अयोग्य लोग योग्य नहीं होते हैं। श्रीमद्भागवत (10.33.30) में कहा गया है:
नैतत् समारेजेज् जातु
मनसापि ह्यनीश्वरः
विनाश्यत्य आचरन् मौढ्याद्
यथा रुद्रो 'ब्धि-जं विषम्
"जो व्यक्ति महान नियंत्रक नहीं है, उसे कभी भी शासक लोगों के व्यवहार की नकल नहीं करनी चाहिए, यहाँ तक कि दिमाग में भी नहीं। अगर कोई साधारण व्यक्ति मूर्खतावश ऐसे व्यवहार की नकल करता है, तो वह खुद को बर्बाद कर लेगा, जैसे कोई ऐसा व्यक्ति जो रुद्र नहीं है अगर वो समुद्र भर का विष पीने की कोशिश करेगा तो खुद को बर्बाद कर लेगा।" इस निर्देश की अवहेलना न करने में ही सावधानी है। श्रीमद्भागवत (10.14.21) में कहीं और कहा गया है:
को वित्ति भूमान भगवान परात्मान
योगेश्वरोतिर भवतस्त्री-लोक्याम्
क्व वा कथं वा कति वा कदेति
विस्तारयन् क्रोडसी योग-मायाम्
"हे सर्वोपरि महान! हे भगवान के सर्वोपरि व्यक्तित्व! हे अतिआत्मा, सभी रहस्यमय शक्तियों के स्वामी! आपके खेल बिना रुके इन तीनों लोकों में हो रहे हैं, लेकिन कौन अनुमान लगा सकता है कि आप कहाँ, कैसे और कब अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहे हैं और ये असंख्य खेल खेल रहे हैं? कोई भी इस रहस्य को नहीं समझ सकता कि आपकी आध्यात्मिक ऊर्जा कैसे काम करती है।"
