श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  2.5.67 
কথো রাত্রে নিত্যানন্দ হুঙ্কার করিযানিজ
দণ্ড-কমণ্ডলু ফেলিলা ভাঙ্গিযা
कथो रात्रे नित्यानन्द हुङ्कार करियानिज
दण्ड-कमण्डलु फेलिला भाङ्गिया
 
 
अनुवाद
उस रात्रि के सन्नाटे में नित्यानंद ने अचानक जोर से गर्जना की और अपना दण्ड तथा कामण्डु तोड़ दिया।
 
In the silence of that night, Nityananda suddenly roared loudly and broke his staff and kamandu.
तात्पर्य
कमंडलु शब्द संन्यासियों और ब्रह्मचारियों दोनों द्वारा उपयोग किए जाने वाले पानी के बर्तन को संदर्भित करता है। घरवालों के पास अशुद्धता से शुद्धता को अलग करने के लिए कई बर्तन होते हैं। हालाँकि, संन्यासियों के पास केवल एक बर्तन होता है, एक कमंडलु। वे हर तरह की गतिविधियों के लिए इस बर्तन का उपयोग करने के लिए बाध्य हैं। शास्त्रों के अनुसार, संन्यासियों का बर्तन एक आलू, या राख के लौकी से बना बर्तन होता है। चूँकि ब्रह्मचारियों का कर्तव्य संन्यासी की सेवा करना है, इसलिए उसे अपने गुरु का कमंडलु ले जाना होगा। उपकुरुवाण-ब्रह्मचारी, जो अपनी व्रत पूरी करने के बाद शादी करते हैं, एक विशेष आश्रम में रहते हैं जिसमें वे एक गृहस्थ शिक्षक के अधीन अध्ययन करते हैं। एक ब्रह्मचारी को एक परिव्राजक-संन्यासी का कमंडलु ले जाना चाहिए। कुछ व्यक्तियों की राय के अनुसार, चूंकि श्री नित्यानंद स्वरूप श्री लक्ष्मीपति तीर्थ के साथ एक ब्रह्मचारी के रूप में रहते थे, उनके पास एक कमंडलु और एक ब्रह्मचारी दंड (कदिर, पलाश या बांस से बना) था। दूसरों के अनुसार, श्री नित्यानंद प्रभु ने श्री माधवेंद्र पुरीपाद के साथ एक ब्रह्मचारी के रूप में यात्रा की। वर्तमान में, तीर्थ और आश्रम संन्यासियों के ब्रह्मचारी शिष्यों को स्वरूप के रूप में जाना जाता है। सरस्वती, भारती और पुरी संन्यासियों के ब्रह्मचारी शिष्यों को चैतन्य के रूप में जाना जाता है। नित्यानंद प्रभु का ब्रह्मचारी नाम स्वरूप था। चूंकि स्वरूप तीर्थ संन्यासियों के शिष्य का ब्रह्मचारी नाम है, इसलिए कुछ लोग उन्हें माधवेंद्र पुरी के अनुयायी के बजाय लक्ष्मीपति तीर्थ का अनुयायी मानते हैं। आम तौर पर दंड दो प्रकार के होते हैं - एकदंड या त्रिदंड (आदि-खंड, अध्याय एक, छंद 157, और आदि-खंड, अध्याय दो, छंद 162 देखें)। श्री नित्यानंद प्रभु ने व्यास-पूजा से पहले अपना दंड और कमंडलु तोड़कर अपनी स्वच्छंदता प्रकट की। जो लोग अनौपचारिक प्रेम के रूपांतरण का अनुभव करते हैं, वे वैधी-भक्ति, या विधि-विधान वाली भक्ति सेवा के अवयवों और बाहरी औपचारिकताओं को पूरी तरह से त्याग देते हैं। लेकिन अगर कोई इकाडे पाका 1 की तरह काम करके गड़बड़ी पैदा करता है, तो उसे रसिक, या पारलौकिक मधुरता में विशेषज्ञ के रूप में पहचाना नहीं जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)