श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  2.5.64 
চৈতন্যের বচন-অঙ্কুশ সবে মানে
নিত্যানন্দ-মত্ত-সিṁহ আর নাহি জানে
चैतन्येर वचन-अङ्कुश सबे माने
नित्यानन्द-मत्त-सिꣳह आर नाहि जाने
 
 
अनुवाद
उन्मत्त सिंहरूपी नित्यानंद भगवान चैतन्य के लौहदंड जैसे शब्दों के वश में थे। उन्हें किसी और चीज़ की परवाह नहीं थी।
 
Nityananda, in the form of a frenzied lion, was under the control of Lord Caitanya's iron-like words. He cared for nothing else.
तात्पर्य
शब्द 'अंकुश' पागल हाथियों को नियंत्रित करने वाली लोहे की छड़ को दर्शाता है। क्योंकि श्री चैतन्यदेव के वाकन या शब्द लोहे की छड़ के रूप में सजीवों के पागलपन और कामवासना को परिष्कृत करते हैं, इसलिए उनके शब्दों को यहाँ वाकन-अंकुश के रूप में वर्णित किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)