जनमैश्वर्य-श्रुत-श्रीभिः एधमान-मदः पुमान्
नैवारहत्यभिधातुं वै त्वामकिंचन-गोचरम्
"हे मेरे भगवान, तुम्हें आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन केवल उन लोगों द्वारा जो भौतिक रूप से थक चुके हैं। जो [भौतिक] प्रगति के मार्ग पर है, आदरणीय माता-पिता, महान वैभव, उच्च शिक्षा और शारीरिक सुंदरता के साथ खुद को सुधारने की कोशिश कर रहा है, वह ईमानदारी से तुम्हारे पास नहीं आ सकता।" रानी कुंती के इस कथन में यह समझा जाता है कि जन्म उच्च जन्म के गर्व को संदर्भित करता है; ईश्वर्य धन के गर्व को संदर्भित करता है; श्रुत ज्ञान, शिक्षा और तपस्या के गर्व को संदर्भित करता है; और श्री शिक्षा, धन, उच्च जन्म, ज्ञान और तपस्या के गर्व को दर्शाता है। हरि के पवित्र नामों का जाप करने से प्रेम और भक्ति प्राप्त होती है। इसलिए उच्च जन्म, धन, ज्ञान और सौन्दर्य के द्वारा पैदा हुए गर्व की प्रधानता वाले लोगों में भगवान के नामों का जाप करके उनके नामों का जाप करके परम भगवान में निवास करने का स्वाद नहीं होता है, और परिणामस्वरूप, भक्ति सेवा प्राप्त नहीं होती है; जबकि सांसारिक घमंड के नियंत्रण से मुक्त भौतिक रूप से थके हुए वैष्णवों में स्वाभाविक रूप से कृष्ण के नामों का जाप करने का स्वाद होता है। गर्वित व्यक्तियों की वैष्णवों के चरणों में अपराध करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति उनकी अंतर्निहित विशेषताओं का हिस्सा है। भगवान ब्रह्मा जैसे व्यक्तियों के लिए ईश्वर का प्रेम ही एकमात्र आनंद है।
