श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  2.5.54-55 
বিদ্যা-ধন-কুল-জ্ঞান-তপস্যার মদে
মোর ভক্ত-স্থানে যার আছে অপরাধে
সে অধম সবারে না দিমু প্রেম-যোগ
নগরিযা প্রতি দিমু ব্রহ্মাদির ভোগ”
विद्या-धन-कुल-ज्ञान-तपस्यार मदे
मोर भक्त-स्थाने यार आछे अपराधे
से अधम सबारे ना दिमु प्रेम-योग
नगरिया प्रति दिमु ब्रह्मादिर भोग”
 
 
अनुवाद
"मैं उन पतित आत्माओं को भगवद्प्रेम प्रदान नहीं करूँगा जिन्होंने मेरे भक्तों को नाराज़ किया है, क्योंकि उन्हें अपनी शिक्षा, धन, उच्च कुल, ज्ञान और तपस्या का अभिमान है। अन्यथा, मैं सभी को वह प्रदान करूँगा जिसका आनंद ब्रह्माजी जैसे व्यक्ति लेते हैं।"
 
"I will not bestow love of God upon those fallen souls who have offended my devotees, because they are proud of their education, wealth, high lineage, knowledge and austerity. Otherwise, I will bestow upon everyone what is enjoyed by persons like Brahma."
तात्पर्य
उन्हें भगवान के भक्तों का अपमान करने का दोष स्वतः मिल जाता है, क्योंकि शिक्षा, संपत्ति, उत्तम जन्म, धर्म ग्रंथों का ज्ञान और कठोर तपस्या से पैदा होने वाला घमंड स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है। वे वैष्णवों का अपमान करते हैं, इस प्रकार वे कृष्ण के प्रेम को प्राप्त करने के अधिकारी नहीं हैं। भगवान ब्रह्मा जैसे व्यक्तियों को प्राप्त होने वाले ईश्वर के प्रेम को मैं श्री मायापुर-नवद्वीप के प्रत्येक निवासी को वितरित करूँगा। देवता मनुष्यों से भगवान के अधिक प्रिय हैं। देवताओं के सांसारिक पद उनकी सम्वैधानिक पहचान नहीं हैं। सभी देवता परम भगवान की उपासना करते हैं और उनकी श्रेष्ठता और हीनता परमेश्वर के प्रति उनके प्रेम की सीमा पर निर्भर करती है। श्री-सम्प्रदाय लक्ष्मीदेवी से उत्पन्न हुआ, ब्रह्म-माध्व-सम्प्रदाय चार सिर वाले ब्रह्मा से उत्पन्न हुआ, विष्णुस्वामी-सम्प्रदाय रुद्रदेव से उत्पन्न हुआ, और निम्बार्क-सम्प्रदाय चार कुमारों से उत्पन्न हुआ। ये देवता जो सम्प्रदाय आचार्य हैं, केवल अपने पदों के गुण पर ही भगवान के भक्त नहीं हैं। अपने-अपने सम्प्रदायों के संस्थापक गुरुओं के रूप में अपनी गतिविधियों के द्वारा भगवान की उपासना की पुष्टि हुई है। हालाँकि भौतिकवादियों की दृष्टि के अनुसार उनका भौतिक भोग से सम्बन्ध है, परन्तु हरि की शुद्ध सेवा उनका सम्वैधानिक कर्तव्य है। श्रीमद भागवतम (1.8.26) में कहा गया है:

जनमैश्वर्य-श्रुत-श्रीभिः एधमान-मदः पुमान्

नैवारहत्यभिधातुं वै त्वामकिंचन-गोचरम्

"हे मेरे भगवान, तुम्हें आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन केवल उन लोगों द्वारा जो भौतिक रूप से थक चुके हैं। जो [भौतिक] प्रगति के मार्ग पर है, आदरणीय माता-पिता, महान वैभव, उच्च शिक्षा और शारीरिक सुंदरता के साथ खुद को सुधारने की कोशिश कर रहा है, वह ईमानदारी से तुम्हारे पास नहीं आ सकता।" रानी कुंती के इस कथन में यह समझा जाता है कि जन्म उच्च जन्म के गर्व को संदर्भित करता है; ईश्वर्य धन के गर्व को संदर्भित करता है; श्रुत ज्ञान, शिक्षा और तपस्या के गर्व को संदर्भित करता है; और श्री शिक्षा, धन, उच्च जन्म, ज्ञान और तपस्या के गर्व को दर्शाता है। हरि के पवित्र नामों का जाप करने से प्रेम और भक्ति प्राप्त होती है। इसलिए उच्च जन्म, धन, ज्ञान और सौन्दर्य के द्वारा पैदा हुए गर्व की प्रधानता वाले लोगों में भगवान के नामों का जाप करके उनके नामों का जाप करके परम भगवान में निवास करने का स्वाद नहीं होता है, और परिणामस्वरूप, भक्ति सेवा प्राप्त नहीं होती है; जबकि सांसारिक घमंड के नियंत्रण से मुक्त भौतिक रूप से थके हुए वैष्णवों में स्वाभाविक रूप से कृष्ण के नामों का जाप करने का स्वाद होता है। गर्वित व्यक्तियों की वैष्णवों के चरणों में अपराध करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति उनकी अंतर्निहित विशेषताओं का हिस्सा है। भगवान ब्रह्मा जैसे व्यक्तियों के लिए ईश्वर का प्रेम ही एकमात्र आनंद है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)