स्वर्ण गौरः सुदीर्घाङ्गस्
त्रि-स्रोत-तीर-सम्भवः दयालुः
कीर्तन-ग्राही
भविष्यामि कलौ युगे
"कलि युग के आरंभ में मैं गंगा तट पर नवद्वीप में एक मोहक स्वर्ण रूप में अवतार लूंगा, जिसमें घुटनों तक पहुंचने वाली भुजाएं होंगी और अपनी अकारण दया से मैं संकीर्तन आंदोलन का उद्घाटन करूंगा।" श्रीमद भागवतम (11.5.32) में भी कहा गया है:
कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं
सांगोपांगास्त्र-पार्षदम्
यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर्
यजन्ति हि सु-मेधसः
"कलियुग में बुद्धिमान लोग भगवान के अवतार की पूजा करने के लिए सामूहिक जप करते हैं जो लगातार कृष्ण के नामों का गान करते हैं। हालांकि उनका रंग काला नहीं है, फिर भी वह स्वयं कृष्ण हैं। उनके साथ उनके सहयोगी, सेवक, हथियार और विश्वासपात्र साथी भी हैं।"
