श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  2.5.53 
সঙ্কীর্তন-আরম্ভে মোহার অবতার
ঘরে ঘরে করিমু কীর্তন-পরচার
सङ्कीर्तन-आरम्भे मोहार अवतार
घरे घरे करिमु कीर्तन-परचार
 
 
अनुवाद
“मैं संकीर्तन आंदोलन का उद्घाटन करने के लिए अवतरित हुआ हूँ, जिसके द्वारा मैं प्रत्येक घर में पवित्र नामों के जप का प्रचार करूँगा।
 
“I have incarnated to inaugurate the Sankirtana movement, by which I will propagate the chanting of the holy names in every home.
तात्पर्य
सौर पुराण में कहा गया है:

स्वर्ण गौरः सुदीर्घाङ्गस्

त्रि-स्रोत-तीर-सम्भवः दयालुः

कीर्तन-ग्राही

भविष्यामि कलौ युगे

"कलि युग के आरंभ में मैं गंगा तट पर नवद्वीप में एक मोहक स्वर्ण रूप में अवतार लूंगा, जिसमें घुटनों तक पहुंचने वाली भुजाएं होंगी और अपनी अकारण दया से मैं संकीर्तन आंदोलन का उद्घाटन करूंगा।" श्रीमद भागवतम (11.5.32) में भी कहा गया है:

कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं

सांगोपांगास्त्र-पार्षदम्

यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर्

यजन्ति हि सु-मेधसः

"कलियुग में बुद्धिमान लोग भगवान के अवतार की पूजा करने के लिए सामूहिक जप करते हैं जो लगातार कृष्ण के नामों का गान करते हैं। हालांकि उनका रंग काला नहीं है, फिर भी वह स्वयं कृष्ण हैं। उनके साथ उनके सहयोगी, सेवक, हथियार और विश्वासपात्र साथी भी हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)