श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.5.46 
যুকতি করযে সবে মনেতে ভাবিযাঘট
ভরি’ গঙ্গা-জল সবে দিল লৈযা
युकति करये सबे मनेते भावियाघट
भरि’ गङ्गा-जल सबे दिल लैया
 
 
अनुवाद
बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने भगवान को गंगाजल से भरा एक घड़ा अर्पित किया।
 
After much deliberation, he offered a pot full of Ganga water to the Lord.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)