श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.5.42 
যারে কৃপা করে, সেই ঠাকুরে সে জানে
দেখিলে ও শক্তি নাহি কহিতে কথনে
यारे कृपा करे, सेइ ठाकुरे से जाने
देखिले ओ शक्ति नाहि कहिते कथने
 
 
अनुवाद
केवल वही व्यक्ति उसे जान सकता है जिस पर प्रभु की कृपा हो। अन्य लोग, यदि देख भी लें, तो भी उसे समझा नहीं सकते।
 
Only one who is blessed by the Lord can know it. Others, even if they see it, cannot explain it.
तात्पर्य
ब्रह्म-तर्क में बताया गया है-

पश्यमानोऽपि तु हरिं न तु वेत्ति कथञ्चन

वित्ति किञ्चित्प्रसादेन हरेरथ गुरोस्तथा

"यदि कोई व्यक्ति भगवान हरि को देख भी लेता है, तो भी वह उनको समझ नहीं पाता। भगवान को तो केवल श्रीहरि और गुरुदेव की कृपा से ही समझा जा सकता है।" श्रीमद्भागवत (10.14.29) में कहा गया है-

अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-

प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि

जानति तत्त्वं भगवान-महिम्नो

न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्

"हे प्रभु! यदि कोई आपके चरण-कमलों की कृपा की थोड़ी सी भी अंश प्राप्त कर लेता है, तो वह आपके व्यक्तित्व की महानता को समझ सकता है। पर जो लोग भगवान को समझने के लिए तर्क-वितर्क करते हैं, वे आपको तब भी नहीं जान पाते, जब कई वर्षों तक वेदों का अध्ययन करते रहें।" पद्मपुराण के उत्तर-खण्ड के अध्याय पन्द्रह में कहा गया है-

चक्षुर्विना यथा दीपं यथा दर्पणमेव च

समीपस्थं न पश्यन्ति तथा विष्णुं बहिर्मुखाः

"जिस प्रकार आँखों से रहित व्यक्ति दीपक या दर्पण की सहायता से भी कुछ नहीं देख पाता, उसी प्रकार भगवान विष्णु के विमुख व्यक्ति उन्हें सामने खड़े होने पर भी नहीं देख सकते।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)