पश्यमानोऽपि तु हरिं न तु वेत्ति कथञ्चन
वित्ति किञ्चित्प्रसादेन हरेरथ गुरोस्तथा
"यदि कोई व्यक्ति भगवान हरि को देख भी लेता है, तो भी वह उनको समझ नहीं पाता। भगवान को तो केवल श्रीहरि और गुरुदेव की कृपा से ही समझा जा सकता है।" श्रीमद्भागवत (10.14.29) में कहा गया है-
अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-
प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि
जानति तत्त्वं भगवान-महिम्नो
न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्
"हे प्रभु! यदि कोई आपके चरण-कमलों की कृपा की थोड़ी सी भी अंश प्राप्त कर लेता है, तो वह आपके व्यक्तित्व की महानता को समझ सकता है। पर जो लोग भगवान को समझने के लिए तर्क-वितर्क करते हैं, वे आपको तब भी नहीं जान पाते, जब कई वर्षों तक वेदों का अध्ययन करते रहें।" पद्मपुराण के उत्तर-खण्ड के अध्याय पन्द्रह में कहा गया है-
चक्षुर्विना यथा दीपं यथा दर्पणमेव च
समीपस्थं न पश्यन्ति तथा विष्णुं बहिर्मुखाः
"जिस प्रकार आँखों से रहित व्यक्ति दीपक या दर्पण की सहायता से भी कुछ नहीं देख पाता, उसी प्रकार भगवान विष्णु के विमुख व्यक्ति उन्हें सामने खड़े होने पर भी नहीं देख सकते।"
