श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.5.33 
চির-দিনে নিত্যানন্দ পাই’ অভিলাষে
বাহ্য নাহি, আনন্দ-সাগর-মাঝে ভাসে
चिर-दिने नित्यानन्द पाइ’ अभिलाषे
बाह्य नाहि, आनन्द-सागर-माझे भासे
 
 
अनुवाद
नित्यानंद के संग की अपनी चिरकालीन अभिलाषा की पूर्ति होने पर भगवान् स्वयं को भूल गए और आनंद के सागर में तैरने लगे।
 
Having fulfilled his long-cherished desire to be in the company of Nityananda, the Lord forgot himself and began to swim in the ocean of bliss.
तात्पर्य
चिरा-दिना शब्द का मतलब होता है "अनंत काल तक"। त्रिविध दुख भौतिक जगत में विद्यमान हैं। दूसरी ओर, आध्यात्मिक विविधता के राज्य में, खुशी का एक सदा-ताजा उद्गार होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)