श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.5.30 
বাহ্য দূর হৈল, বসন নাহি রয
ধরযে বৈষ্ণব-গণ, ধরণ না যায
बाह्य दूर हैल, वसन नाहि रय
धरये वैष्णव-गण, धरण ना याय
 
 
अनुवाद
उनकी सारी बाह्य चेतना नष्ट हो गई और उनका वस्त्र बिखर गया। यद्यपि वैष्णवों ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया, परन्तु वे असफल रहे।
 
All his external consciousness was destroyed, and his clothes were torn apart. Although the Vaishnavas tried to calm him down, they were unsuccessful.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)