श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.5.3 
জয জয অদ্বৈতাদি-ভক্তের অধীন
ভক্তি-দান দেহ’ প্রভু উদ্ধারহ দীন
जय जय अद्वैतादि-भक्तेर अधीन
भक्ति-दान देह’ प्रभु उद्धारह दीन
 
 
अनुवाद
अद्वैतवादी भक्तों द्वारा नियंत्रित प्रभु की जय हो! हे प्रभु, कृपया अपनी भक्ति का वितरण करें और पतित आत्माओं का उद्धार करें।
 
Glory to the Lord controlled by non-dualistic devotees! O Lord, please distribute Your devotion and save the fallen souls.
तात्पर्य
"अज्ञान भक्तिरहित हूँड़ों को कृष्ण-सेवा भाव देकर भौतिक सुखो में डूबे हुओं से छुड़ाओ।" अद्वैत की इच्छा के अनुसार, भगवान् गौरासुंदर इस संसार में भक्ति फैलाने के लिए अवतरित हुए। प्रभु का अवतरण इस संसार में भगवान् श्री अद्वैत की आज्ञा का पालन करने के लिए था; इसलिए, क्योंकि उन्होंने अद्वैत के आग्रह को पूर्ण किया, गौरासुंदर उनके नियंत्रण में हैं। चैतन्य-चंद्रामृत (36) में कहा गया है: "जो व्यक्ति श्री चैतन्य महाप्रभु के धर्म के दौरान बह रही भक्ति की अमृत धारा से लाभ नहीं उठाता है वह निश्चित रूप से सबसे गरीब है।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)