| श्री चैतन्य भागवत » खण्ड 2: मध्य-खण्ड » अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन » श्लोक 146-148 |
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| | | | श्लोक 2.5.146-148  | শ্রদ্ধা করি’ মূর্তি পূজে ভক্ত না আদরে’
মূর্খ, নীচ, পতিতেরে দযা নাহি করে
এক অবতার ভজে, না ভজযে আর
কৃষ্ণ-রঘুনাথে করে ভেদ-ব্যবহার
’বলরাম-শিব-প্রতি প্রীত নাহি করে
ভক্তাধম’ শাস্ত্রে কহে এ সব জনারে | श्रद्धा करि’ मूर्ति पूजे भक्त ना आदरे’
मूर्ख, नीच, पतितेरे दया नाहि करे
एक अवतार भजे, ना भजये आर
कृष्ण-रघुनाथे करे भेद-व्यवहार
’बलराम-शिव-प्रति प्रीत नाहि करे
भक्ताधम’ शास्त्रे कहे ए सब जनारे | | | | | | अनुवाद | | जो लोग भगवान के अर्चाविग्रह रूप की श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, किन्तु उनके भक्तों का सम्मान नहीं करते; जो मूर्खों, दीन-दुखी तथा पतित लोगों पर दया नहीं करते; जो भगवान के एक अवतार की पूजा करते हैं तथा अन्य अवतारों की पूजा नहीं करते; जो कृष्ण तथा रामचन्द्र में भेद करते हैं; तथा जो बलराम तथा शिव के प्रति प्रेम नहीं रखते, वे शास्त्रों के अनुसार सभी भक्तों में अधम हैं। | | | | Those who reverently worship the Deity form of the Lord but do not respect His devotees; those who do not show mercy to the foolish, the poor, and the fallen; those who worship one incarnation of the Lord and do not worship the others; those who differentiate between Krishna and Ramacandra; and those who do not love Balarama and Shiva are, according to the scriptures, the lowest of all devotees. | |
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