श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  2.5.145 
যত পাপ হয প্রজা-জনেরে হিṁসিলে
তার শত-গুণ হয বৈষ্ণব নিন্দিলে
यत पाप हय प्रजा-जनेरे हिꣳसिले
तार शत-गुण हय वैष्णव निन्दिले
 
 
अनुवाद
किसी वैष्णव की निन्दा करना सामान्य जीवों से ईर्ष्या करने से सौ गुना अधिक पाप है।
 
To criticize a Vaishnava is a hundred times more sinful than to envy ordinary beings.
तात्पर्य
भगवान विष्णु हर मनुष्य के दिल में वास करते हैं। और हालाँकि वैष्णव सामान्य मनुष्य ही दिखते हैं, लेकिन वे हमेशा अपने दिल में निवास करने वाले भगवान विष्णु की सेवा की इच्छा के कारण वैष्णव के रूप में विराजमान रहते हैं। सामान्य इंसान विष्णु की सेवा से वंचित होता है और वह राग और अंधकार में डूबा रहता है, जबकि वैष्णव पूरी तरह से सच्चाई के गुण से भरपूर रहते हैं और हमेशा विष्णु की सेवा में लगे रहते हैं। इसलिए यदि कोई उनके बीच होने वाले अंतर को ध्यान से देखता है, तो यह समझ में आता है कि विष्णु की सेवा में लगे एक वैष्णव से ईर्ष्या करने पर सामान्य इंसान से ईर्ष्या करने पर होने वाले पापों या अपराधों से सौ गुना अधिक पाप या अपराध लगते हैं। श्रीमद् भागवतम में (4.4.13) कहा गया है:

नाश्चर्यं एतद् यद् असत्सु सदा

महद्-विनिंदा कुणपात्मा-वाद़िषु

सेर्ष्यं महापुरुष-पाद-पांसुभिर्

निरस्त-तेजःसु तदेव शोभनम

"यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जिन लोगों ने अस्थायी भौतिक शरीर को ही अपना आत्म स्वीकार कर लिया है, वो हमेशा महान आत्माओं को अपमानित करते रहें। भौतिकवादी लोगों की इस प्रकार की ईर्ष्या बहुत अच्छी होती है क्योंकि इसी तरह से वे पतन की ओर जाते हैं। वे महान व्यक्तियों के चरणों की धूल से कम हो जाते है।" स्कंद पुराण में कहा गया है:

यो हि भागवतं लोकम उपहासं नृपोत्तम

करोति तस्य नश्यंति अर्थ-धर्म-यशः-सुताः

निंदां कुर्वंती ये मूढा वैष्णवानां महात्मनां

पतंति पितृभिः सार्धं महा-रौरव-संज्ञिते

हंति निंदति वै द्वेष्टि वैष्णवान नाभिनंदति

क्रुध्यते याति न हर्षं दर्शने पतनानि षट

पूर्वं कृत्वा तु सम्मानम वज्रां कुरुते तु यः

हवैष्णवानां मही-पाल सांवयो याति संक्षयं

"हे राजन, यदि कोई किसी महान भक्त का उपहास करता है, तो वह अपने पुण्य कर्मों के फलों, अपने ऐश्वर्य, अपनी प्रतिष्ठा और अपने पुत्रों को खो देता है। वैष्णव सभी महान आत्माएं हैं। जो कोई भी उनकी निंदा करता है, वह महाराऊरव के नाम से जाने जाने वाले नरक में गिर जाता है। उसके पूर्वज भी उसके साथ होते हैं। जो कोई भी वैष्णव की हत्या करता है या उसकी निंदा करता है, जो कोई भी वैष्णव से ईर्ष्या करता है या उससे नाराज रहता है, और जो कोई भी वैष्णव को प्रणाम नहीं करता है या वैष्णव को देखकर खुशी महसूस नहीं करता है, निश्चित रूप से नारकीय स्थिति में चला जाता है। हे जगत के राजा, जो पहले एक वैष्णव का सम्मान करता है और फिर उसका अपमान करता है, वह अपने परिवार के साथ नष्ट हो जाता है।" अमृत-सारोद्धार में कहा गया है:

जन्म-प्रभृति यत् किंचित सुकृतं समुपार्जितम

नाशम आयाति तत् सर्वं पीड़येद् यदि वैष्णवान

"यदि कोई वैष्णवों को पीड़ा देता है, तो उसकी साधनाओं के फल जैसे उच्च जन्म और उच्च जाति सभी नष्ट हो जाते हैं।" द्वारका-माहात्म्य में कहा गया है:

कर-पत्रैश्च फाल्यंते सु-तीव्रैर् यम-शासनैः

निंदां कुर्वंति ये पापा वैष्णवानां महात्मनां

पूजितो भगवान विष्णुर् जन्मान्तर-शतैर अपि

प्रसीदति न विश्वात्मा वैष्णवे चापमानिते

"जो परम पापी महान वैष्णवों की आलोचना करते हैं, यमराज उन्हें बहुत तेज आरी से टुकड़े-टुकड़े करने की कठोर सज़ा देते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड की अध्यात्मिक आत्मा भगवान हरि उस दुष्ट व्यक्ति से कभी प्रसन्न नहीं होते हैं जो वैष्णव का अपमान करता है, भले ही उसने सैकड़ों जन्मों तक विष्णु की पूजा की हो।" ब्रह्म-वैवर्त पुराण, कृष्ण-जन्म-खंड में, कहा गया है:

ये निंदंति हृषीकेशं तद्-भक्तं पुण्य-रूपिणम

शत-जन्मारिर्नं पुण्यं तेषां नश्यति निश्चितम

ते पतंति महा-घोरे कुम्भीपाके भयानके

भक्षितः कीट-संगेन यावद् चंद्र-दिवाकरौ

तस्य दर्शन-मात्रेण पुण्यं नश्यति निश्चितम

गंगा स्नात्वा रविं दृष्टा तदा विद्वान विशुद्ध्यति

"जो लोग भगवान हृषीकेश और उनके भक्तों की आलोचना करते हैं, वे सौ पुण्य जन्मों में अर्जित सभी लाभों को खो देते हैं। ऐसे पापी कुम्भीपाक नरक में सड़ते हैं और उन्हें कीड़ों के झुंड उतने समय तक खाते रहते हैं जितने समय तक सूर्य और चंद्रमा मौजूद रहते हैं। यदि कोई ऐसे व्यक्ति को देखता है जो भगवान विष्णु और उनके भक्तों की निंदा करता है, तो उसके सभी पुण्य कर्मों के फल समाप्त हो जाते हैं। जब विद्वान ऐसे गैर-वैष्णवों को देखते हैं, तो वे गंगा में स्नान करके और सूर्य को देखकर खुद को शुद्ध करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)