श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  2.5.143 
এক হস্তে যেন বিপ্র-চরণ পাখালে
আর হস্তে ঢেলা মারে মাথায, কপালে
एक हस्ते येन विप्र-चरण पाखाले
आर हस्ते ढेला मारे माथाय, कपाले
 
 
अनुवाद
उनकी पूजा ऐसी है जैसे कोई एक हाथ से ब्राह्मण के पैर धोता है और दूसरे हाथ से उसके सिर पर मारता है।
 
Their worship is like washing the feet of a Brahmin with one hand and hitting him on the head with the other.
तात्पर्य
जीवों से ईष्र्या करके स्वत: ही भगवान विष्णु से ईष्र्या की जाती है, जो उनके हृदय में स्थित हैं। जैसे कि एक व्यक्ति के द्वारा एक हाथ से ब्राह्मण के सिर पर पत्थर मारना और दूसरी ओर उसके चरणों को धोना असंगत है; इसी प्रकार यदि कोई भगवान विष्णु की पूजा तो करता है लेकिन वैष्णव की पूजा के प्रति उदासीन है, जो विष्णु से भिन्न नहीं है, तो वह पूजा दुख का स्रोत बन जाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)