श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 140-141
 
 
श्लोक  2.5.140-141 
বৈষ্ণব-হিṁসার কথা সে থাকুক দূরে
সহজ জীবেরে যে অধম পীডা করে
বিষ্ণু পূজিযা ও যে প্রজার পীডা করে
পূজা ও নিষ্ফলে যায, আর দুঃখে মরে
वैष्णव-हिꣳसार कथा से थाकुक दूरे
सहज जीवेरे ये अधम पीडा करे
विष्णु पूजिया ओ ये प्रजार पीडा करे
पूजा ओ निष्फले याय, आर दुःखे मरे
 
 
अनुवाद
वैष्णवों से ईर्ष्या करने की तो बात ही क्या, यदि कोई सामान्य जीवों को कष्ट पहुँचाता है, तो वह पतित और निम्न श्रेणी का व्यक्ति माना जाता है। भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद भी, यदि कोई अन्य जीवों को कष्ट पहुँचाता है, तो उसकी पूजा निष्फल हो जाती है। ऐसा व्यक्ति असीमित दुःख भोगता है।
 
Forget about being jealous of Vaishnavas, anyone who harms ordinary beings is considered a fallen and low-class person. Even after worshipping Lord Vishnu, if someone harms other living beings, their worship becomes fruitless. Such a person experiences unlimited suffering.
तात्पर्य
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर या अनजाने में भगवान हरि की एकनिष्ठ सेवा में लगे किसी वैष्णव से ईर्ष्या करता है, तो उसका पतन निश्चित है। इसमें कोई संदेह नहीं है। इसके अतिरिक्त, यदि विष्णु के भक्त होने का दावा करने वाले व्यक्ति भी साधरण जीवों से ईर्ष्या करते हैं और उन्हें तरह-तरह के कष्ट देते हैं, तो वे वास्तव में विष्णु की भक्ति सेवा से बहुत दूर हैं और उन्हें इंसान कहलाने के लायक नहीं हैं। विष्णु की उनकी पूजा दुख का स्रोत बन जाती है। जो लोग जीव-दया की अनुपस्थिति से संपन्न हैं, या अन्य जीवित प्राणियों के लिए करुणा नहीं रखते हैं, फिर भी गर्व से खुद को भगवान विष्णु का सेवक मानते हैं, वे भगवान की भक्ति सेवा के बजाय त्रिविध दुख प्राप्त करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)