श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 129
 
 
श्लोक  2.5.129 
অহর্-নিশ শ্রী-মুখে নাহিক অন্য কথা“
মুঞি তাঙ্র, সেহ মোর ঈশ্বর সর্বথা
अहर्-निश श्री-मुखे नाहिक अन्य कथा“
मुञि ताङ्र, सेह मोर ईश्वर सर्वथा
 
 
अनुवाद
दिन-रात उनके मुख से यही शब्द निकलते थे कि, "मैं उनका सेवक हूँ और वे सभी प्रकार से मेरे स्वामी हैं।"
 
Day and night the same words came out of his mouth, "I am his servant and he is my master in every way."
तात्पर्य
"मैं सर्वोपरि स्वामी का हूँ" और "मैं स्वामी का हूँ" जैसे वक्तव्य लगातार श्री नित्यानंद के मुंह से निकलते रहते थे। उन्होंने कुछ और नहीं कहा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)