"मैं सर्वोपरि स्वामी का हूँ" और "मैं स्वामी का हूँ" जैसे वक्तव्य लगातार श्री नित्यानंद के मुंह से निकलते रहते थे। उन्होंने कुछ और नहीं कहा।