नित्यानंद स्वरूप के विचार और शब्द हैं, "भगवान चैतन्य परम भगवान हैं, और मैं उनके शाश्वत सेवकों में से एक हूं।"
The thoughts and words of Nityananda Svarupa are, "Lord Chaitanya is the Supreme Lord, and I am one of His eternal servants."
तात्पर्य
अपने मन और वचन से श्री नित्यानंद प्रभु ने श्री चैतन्यदेव को अपना स्वामी स्वीकार किया और स्वयं को उस प्रभु का सेवक माना। चैतन्य-चरितामृत (आदि 5.137) में कहा गया है: आपनाके भृत्य करी' कृष्णे प्रभु जाने-"वे स्वयं को सेवक मानते हैं और कृष्ण को अपना स्वामी जानते हैं।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥