श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  2.5.126 
স্বভাব কহিতে বিষ্ণু-বৈষ্ণবের প্রীত
অতএব বেদে কহে স্বভাব-চরিত
स्वभाव कहिते विष्णु-वैष्णवेर प्रीत
अतएव वेदे कहे स्वभाव-चरित
 
 
अनुवाद
विष्णु और वैष्णव दोनों एक दूसरे की स्तुति करने में आनंद लेते हैं, इसलिए वेदों में उनकी सहज लीलाओं का वर्णन किया गया है।
 
Both Vishnu and Vaishnava enjoy praising each other, so their spontaneous pastimes are described in the Vedas.
तात्पर्य
परम प्रभु से भक्तों की कीर्तन सुनना विशेष रुप से महत्त्वपूर्ण होता है। प्रभु विष्णु और वैष्णव दोनों ही एक-दूसरे के गुणों का वर्णन करने पर प्रसन्न होते हैं। इसी कारण से वैदिक साहित्य विष्णु और वैष्णवों के सहज लीलाओं को महिमामंडित करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)