श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 122
 
 
श्लोक  2.5.122 
ব্রহ্মা-মহেশ্বর-বন্দ্য যদ্যপি
কমলাতবু তাঙ্র স্বভাব চরণ-সেবা-খেলা
ब्रह्मा-महेश्वर-वन्द्य यद्यपि
कमलातबु ताङ्र स्वभाव चरण-सेवा-खेला
 
 
अनुवाद
यद्यपि लक्ष्मी की पूजा ब्रह्मा तथा शिव द्वारा की जाती है, किन्तु उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति परमेश्र्वर के चरणकमलों की सेवा करने की है।
 
Although Lakshmi is worshipped by Brahma and Shiva, her natural inclination is to serve the lotus feet of the Supreme Lord.
तात्पर्य
स्वयं प्रकाश बालदेव प्रभु अपने को संकर्षण के रूपों में और विष्णु के विविध रूपों में प्रकट करते हैं और दूसरों से सेवा स्वीकार करते हैं, फिर भी उनका सेवा भाव अविचलित रहता है। इस कथन को पुष्ट करने के लिए लेखक लक्ष्मी देवी, जो कि भाग्य की देवी हैं, का उदाहरण देते हैं। कृष्ण की सेवा भी लक्ष्मी का स्वाभाव है जिनकी ब्रह्मा और शिव पूजा करते हैं। हालाँकि लक्ष्मी देवी का चार मुख वाले ब्रह्मा और विनाश के देवता शिव सम्मान करते हैं, फिर भी वह प्रभु की सेवा में लीन रहती हैं। श्रीमद भागवत में (3.15.21) यह कहा गया है :

श्री रूपिणी क्वणयती चरणारविन्दं

लीलाम्बुजेन हरि सद्मनि मुक्ता दोषा

संलक्ष्यते स्फटिक कुड्य उपेता हेम्नि

सम्मार्जतीव यदनुग्रहणे अन्य यत्नः

"वैकुण्ठ ग्रहों में महिलाएं खुद भाग्य की देवी की तरह सुंदर हैं। ऐसी अलौकिक सुंदर महिलाएं, जिनके हाथों में कमल है और पैरों में पायल है, कभी-कभी संगमरमर की दीवारों को साफ करती हुई देखी जाती हैं, जो कि बीच-बीच में सोने की सीमाओं से सजी हुई हैं, ताकि ईश्वर के परम व्यक्तित्व का अनुग्रह प्राप्त हो सके।”

श्रीमद भागवत में अन्य जगह (1.16.32) यह कहा गया है :

ब्रह्मादयो बहु तिथम् यदपां गमोक्ष-

कामास तपः समचरण भगवत प्रपन्नाः

सास्रीः स्व वासम अरविन्द वनम् विहाया

यत पद सौभगम् अलम् भजते अनुराक्ता

“लक्ष्मी जी, भाग्य की देवी, जिनकी कृपा की एक झलक के लिए ब्रह्मा जैसे देवताओं ने ईश्वर के व्यक्तित्व को प्राप्त करने के लिए कई दिनों तक आत्मसमर्पण किया, उन्होंने कमल के फूलों के जंगल में अपना निवास त्याग दिया और प्रभु के चरण कमलों की सेवा में संलग्न हो गईं।”

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)