श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 5: नित्यानंद की व्यास-पूजा समारोह और उनका भगवान के षड्भुज रूप का दर्शन  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  2.5.118 
’স্বামী করি’ শব্দে সে বলেন কৃষ্ণ প্রতি
ভক্তি বিনা কখন না হয অন্য মতি
’स्वामी करि’ शब्दे से बलेन कृष्ण प्रति
भक्ति विना कखन ना हय अन्य मति
 
 
अनुवाद
वे कृष्ण को स्वामी कहकर संबोधित करते हैं। उनका मन कभी भी भक्ति से विचलित नहीं होता।
 
He addresses Krishna as Swami. His mind never wavers from devotion.
तात्पर्य
श्री बलदेव प्रभु कृष्ण को स्वामी या भगवान कहकर पुकारते हैं। बलराम कृष्ण की सेवा के अलावा किसी और के बारे में नहीं सोचते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)